अधजल गगरी छलकत जाए

अधजल गगरी छलकत जाए

415


करे कम ज्यादा बतलाए
अल्प ज्ञान पा खल इतराए
अधजल गगरी छलकत जाए।

 

गुरु संग कुतर्क,सत्य का खंडन
स्वयं का झूठा महिमा मंडन
गलत स्रोत की सहज कमाई
छोटी नदी जल भरी उतराई
थोड़े धन पा खल बौराए।
अधजल गगरी छलकत जाए।।

 

गलत करे समझे चतुराई
थोथी दलील, बेवजह लड़ाई
रचता झूठ, प्रपंच, भौकाल
स्वप्रचार एकमात्र खयाल
हल्के थोथे जल उपलाए।
अधजल गगरी छलकत जाए।।

 

अपने मुंह मियां मिट्ठू
स्वार्थी, स्वाँगी मिथ्यापिठू
वैशाखनंदन गलतफहमी माने
सुखी घास निज-चरा जाने
बिन खाये ही जाय आघाए।
अधजल गगरी छलकत जाए।।

 

गिरि-सम गंभीर होते पूर्ण ज्ञानी
शांत चित और मीठी वाणी
सम्पूर्णता, गुरुत्व,नम्रता वाहक
झुकते वृक्ष होके फल धारक
भरी गगरिया चुपके जाए।
अधजल गगरी छलकत जाए।।
 

Raj Singh

Hi There. I'm a professional Educator Cum Entrepreneur. Have done Technical as well as Professional Degree, Having Experience of 10 years as Educator and 8 Years of Entrepreneurship.

Comments Here